भुवन ऋभुः बच्चों के अधिकारों की वैश्विक आवाज़ 300,000 से अधिक बाल विवाह रोके, 85,000 से ज़्यादा बच्चों को ट्रैफिकिंग से बचाया — कानून और जनांदोलन से रच रहे इतिहास
भुवन ऋभुः बच्चों के अधिकारों की वैश्विक आवाज़
300,000 से अधिक बाल विवाह रोके, 85,000 से ज़्यादा बच्चों को ट्रैफिकिंग से बचाया — कानून और जनांदोलन से रच रहे इतिहास
भोपाल हेडलाइंस
संतोष योगी की खबर 9993268143
भोपाल नई दिल्ली।दुनिया के सबसे प्रभावशाली बाल अधिकार कार्यकर्ताओं में से एक, भुवन ऋभु ने बच्चों के लिए न्याय को केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक ठोस हक बना दिया है। वे जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (JRC) नेटवर्क के संस्थापक हैं, जो आज 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ भारत के 440 संवेदनशील जिलों में सक्रिय है। पिछले दो वर्षों में ही JRC ने सरकारी सहयोग से 3 लाख से अधिक बच्चों को बाल विवाह से बचाया और 85,000 से अधिक ट्रैफिकिंग के शिकार बच्चों को आज़ाद कराया।
पिछले दो दशकों से ऋभु आधुनिक दासता, बच्चों की ट्रैफिकिंग, बंधुआ मजदूरी, यौन शोषण और बाल विवाह जैसी अमानवीय बुराइयों के खिलाफ कानून को बच्चों की ढाल बनाकर खड़े हैं। उनके प्रयासों ने भारत की बाल संरक्षण नीति की परिभाषा ही बदल दी है — जहां पहले यह केवल 'कल्याण' से जुड़ा विषय था, आज यह 'न्याय' का केंद्रीय प्रश्न बन गया है, जिसमें त्वरित कार्रवाई, जवाबदेही और आपराधिक न्याय प्रणाली की ज़रूरत है।
विधायी बदलावों में नेतृत्व
ऋभु ने संशोधित बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 जैसे महत्वपूर्ण कानूनों के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई, जिसने 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के श्रम पर रोक लगाई। उनकी जनहित याचिका के बाद 2013 में लापता बच्चों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया, जिसने देश की बाल सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलावों की शुरुआत की।
बाल विवाह के खिलाफ सबसे बड़ा जन आंदोलन
वर्ष 2023 में, उन्होंने बाल विवाह को "बच्चों से बलात्कार" के रूप में परिभाषित कर इसे एक आपराधिक कृत्य के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया। इसके साथ उन्होंने एक राष्ट्रीय जनांदोलन खड़ा किया, जिसकी अगुआई महिलाओं, किशोरियों और नागरिक समाज संगठनों ने की। यह आंदोलन आज भारत और नेपाल के सरकारी अभियानों को प्रेरित कर चुका है और 39 देशों में फैलते हुए 2030 तक बाल विवाह समाप्त करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक जीत
2024 में, उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने "चाइल्ड पोर्नोग्राफी" शब्द के स्थान पर "सीसीम (Child Sexual Exploitation and Abuse Material)" शब्द के अनिवार्य प्रयोग का ऐतिहासिक निर्णय दिया, जिससे बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की परिभाषा और समझ दोनों में गंभीर बदलाव आया।
वैश्विक मंच पर भारत की आवाज़
भुवन ऋभु, जो कानून के विद्यार्थी रहे हैं, ‘When Children Have Children’ और ‘Just Rights: Why Justice Should Be a Fundamental Right’ जैसी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक हैं। मई 2025 में उन्हें वर्ल्ड ज्यूरिस्ट एसोसिएशन द्वारा "बच्चों के लिए एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण विश्व के निर्माण के अथक विधिक प्रयासों" के लिए मेडल ऑफ ऑनर से नवाज़ा गया।
इसके बाद उन्हें JURISTS FOR CHILDREN WORLDWIDE NETWORK का सह-संस्थापक और अध्यक्ष नियुक्त किया गया — एक वैश्विक मंच, जो दुनिया भर के विधिक विशेषज्ञों को बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट करता है
