6 वर्षीय बच्चे को ‘स्किल्ड वर्कर’ मानकर 19.80 लाख का मुआवजा एमएसीटी भोपाल का ऐतिहासिक फैसला, भविष्य के दावों के लिए बनी नई मिसाल

 

संतोष योगी की खबर

 

भोपाल। मध्य प्रदेश में पहली बार किसी अवयस्क बच्चे को स्किल्ड वर्कर मानते हुए मुआवजा तय करने का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया है। एमएसीटी भोपाल ने दमोह जिले के 6 वर्षीय हरिराम गौड़ की सड़क दुर्घटना में मौत के मामले में 19 लाख 80 हजार रुपये का रिकॉर्ड मुआवजा देने का आदेश दिया। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार को बड़ी राहत देने वाला है, बल्कि भविष्य के मोटर दुर्घटना क्लेम मामलों में एक नई न्यायिक दिशा भी स्थापित करता है।

 

कैसे हुई दर्दनाक घटना

 

अधिवक्ता अमित ठाकुर जी ने बताया रायसेन जिले के खंडेल गाँव की घटना है मासूम हरिराम दोपहर का भोजन लेने जा रहा था। इसी दौरान भोपाल–सागर हाईवे पर तेज रफ्तार कार ने उसे टक्कर मार दी। परिजन उसे तत्काल अस्पताल ले जा रहे थे, लेकिन रायसेन हॉस्पिटल पहुँचते-पहुँचते उसकी मौत हो गई। मजदूर परिवार न्याय की उम्मीद में भोपाल एमएसीटी पहुँचा, जहां उनकी ओर से विद्वान अधिवक्ता अरुण त्रिपाठी और मैंने व उमेश द्वेदी ने पक्ष रखा।

 

स्किल्ड वर्कर मानकर आय निर्धारण

 

अधिवक्ता अमित ठाकुर ने बताया कि वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण त्रिपाठी जी ने इस कैस में विशेष ध्यान दिया और सुप्रीम कोर्ट के हालिया ‘नगजी भाई जजमेंट’ का हवाला देते हुए कोर्ट में तर्क दिया कि 1 से 15 वर्ष तक के बच्चों को स्किल्ड वर्कर की श्रेणी में मानते हुए न्यूनतम आय 11,885 रुपये प्रतिमाह मानी जानी चाहिए। अदालत ने यह तर्क स्वीकार किया और 40% फ्यूचर प्रोस्पेक्ट्स जोड़कर मुआवजा राशि को 19.80 लाख रुपये अनुमोदित किया।

 

बीमा कंपनी की आपत्ति खारिज

 

बीमा कंपनी ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज की कि बच्चा अवयस्क था और दुर्घटना में उसकी लापरवाही भी हो सकती है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चा अपने परिजनों के साथ चल रहा था, इसलिए उसकी तरफ से किसी भी तरह की लापरवाही नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने बीमा कंपनी की सभी दलीलें खारिज कर दीं।

 

मध्य प्रदेश के न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर

 

अधिवक्ता अमित ठाकुर ने निर्णय को प्रदेश की न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। इस केस में विद्वान अधिवक्ता अरुण त्रिपाठी जी का विशेष योगदान रहा और उमेश द्विवेदी का भी विशेष योगदान रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अवयस्क बच्चों के मुआवजा निर्धारण के मानकों को नई दिशा देगा और समान मामलों में यह आदेश एक मजबूत मिसाल बनेगा।