ज्योतिष शास्त्र में कालामृत योग का विशेष महत्व

संतोष योगी की खबर 99932 68143

भोपाल। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में कई ऐसे योग बताए गए हैं जो व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण योग कालामृत योग है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह योग मुख्य रूप से राहु और केतु की विशेष स्थिति से बनता है और इसे कई विद्वान कालसर्प योग का एक विशिष्ट स्वरूप भी मानते हैं।

कालामृत योग की स्थिति

जब जन्मकुंडली के सभी सात मुख्य ग्रह — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि — केतु से राहु के बीच स्थित हों, तब कालामृत योग का निर्माण होता है। इस योग में केतु आगे (मुख) की ओर और राहु अंत में होता है।

वहीं यदि सभी ग्रह राहु से केतु के बीच हों, तो उसे कालसर्प योग कहा जाता है।

प्रभाव और विशेषताएं

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार केतु को आध्यात्मिकता, मोक्ष और वैराग्य का कारक माना जाता है, इसलिए कालामृत योग के प्रभाव कुछ अलग प्रकार के होते हैं।

संघर्ष के बाद सफलता: इस योग वाले व्यक्ति को जीवन के शुरुआती दौर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन आगे चलकर मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से सफलता मिलती है।

आध्यात्मिक रुचि: केतु के प्रभाव से ऐसे जातक अक्सर आध्यात्म, योग, ज्योतिष या गूढ़ विद्याओं की ओर आकर्षित होते हैं।

मानसिक चिंतन: कई बार मन में असुरक्षा या अज्ञात भय की भावना भी हो सकती है, जो व्यक्ति को आत्ममंथन की ओर प्रेरित करती है।

विशेष प्रतिभा: ऐसे लोगों में अक्सर कोई न कोई विशेष प्रतिभा होती है जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती है।

उपाय और साधना

यदि किसी की कुंडली में कालामृत योग प्रतिकूल प्रभाव दे रहा हो, तो ज्योतिष शास्त्र में कुछ उपाय बताए गए हैं—

भगवान शिव की उपासना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप

भगवान गणेश की नियमित पूजा और “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जप

काले कुत्ते को रोटी खिलाना या पक्षियों को दाना डालना

कुलदेवता का स्मरण और नियमित पूजा

ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि इन उपायों से राहु-केतु के नकारात्मक प्रभावों में काफी कमी आ सकती है।

समस्या निवारण हेतु संपर्क:

आचार्य रजनीनंदा निखिल

तंत्राचार्य एवं ज्योतिषाचार्य, भोपाल (म.प्र.)

मो. 8305704084